
वॉइसऑफ़ बहादुरगढ़ न्यूज़ :
डॉ. कंचन मखीजा।
भक्तियोग ज्ञान और कर्म के साथ मोक्ष के तीन प्रमुख मार्गों में से सबसे सहज, सरल और हृदय के समर्पण से परमात्मा तक पहुंचने का एक सहज मार्ग है। यह शुद्ध, निःस्वार्थ प्रेम, समर्पण और निष्ठा का मार्ग है जिसमें तर्क या कर्मकांड का नहीं, बल्कि एक ऐसा स्वर जो सीधे हृदय के तारों को छूकर, आत्मा को उसके स्रोत से जोड़ देता है,एक ऐसा पुल जो सीमित ‘मैं’ को अनंत ‘तू’ से मिला देता है। भक्तियोग का केंद्र बिंदु है ईश्वर के प्रति उत्कट एवं निस्वार्थ प्रेम। यहाँ भक्त स्वयं को पूर्णतः परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है। जैसा कि नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है, यह प्रेम “अमृत-स्वरूपा” है, जो सभी बंधनों से मुक्त कर देती है। यह मार्ग बाहरी आडंबरों पर नहीं, बल्कि आंतरिक विकास और हृदय की शुद्धि पर केंद्रित है। इससे सांसारिक इच्छाएँ और विकार स्वतः विलीन होने लगते हैं और एक गहन आध्यात्मिक आनंद का स्फुरण होता है। श्रीमद्भागवत में वर्णित ‘नवधा भक्ति’ इसके नौ सोपान प्रस्तुत करती है, जो साधक को परम लक्ष्य तक ले जाते हैं:-श्रवणम्: भगवान की लीलाओं, महिमा और नाम का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना। कीर्तनम्: उनके गुणों का गान करना, भजन-कीर्तन में लीन होना। स्मरणम्: निरंतर उनका स्मरण करते रहना। पादसेवनम्: प्रतीकात्मक रूप से उनके चरणों की सेवा का भाव रखना। अर्चनम्: पुष्प, जल, धूप आदि से पूजा-अर्चना करना। वंदनम्: प्रार्थना और नमन के साथ वंदना करना। दास्यम्: सेवकभाव से ईश्वर की सेवा में तत्पर रहना। सख्यम्: ईश्वर को अपना आत्मीय मित्र मानकर स्नेहपूर्ण संबंध स्थापित करना। आत्मनिवेदनम्: स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देना; यह भक्ति का सर्वोच्च शिखर है। भक्तियोग की सरलता यह है कि यह सभी के लिए सुलभ है। जाति, लिंग, ज्ञान या सामाजिक स्तर का यहाँ कोई बंधन नहीं। जिसका हृदय प्रेम के लिए धड़कता है, वह इस मार्ग पर चल सकता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं इसे सर्व श्रेष्ठ कहा है क्योंकि यहाँ प्रेम ही साध्य है और प्रेम ही साधना एवं साधन।

