आसन एवं प्राणशक्ति

आसन एवं प्राणशक्ति

योग-दर्शन में आसन और प्राणशक्ति को साधना की आधारशिला माना गया है। योग की यात्रा केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और चेतना के गहन संतुलन की प्रक्रिया है। इस संतुलन की शुरुआत आसन से होती है और उसका विस्तार प्राणशक्ति के संयम तक पहुँचता है।
आसन का वास्तविक अर्थ केवल किसी विशेष मुद्रा में बैठना नहीं है। स्थिरता के भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम ही आसन है। इसका तात्पर्य यह है कि साधक इतनी स्थिरता और सहजता से बैठ सके कि उसे अपने शरीर के अस्तित्व का भी भान न रहे। सामान्यतः कुछ ही मिनटों में शरीर में पीड़ा, असहजता या चंचलता उत्पन्न हो जाती है, किंतु जब साधक स्थूल देहभाव से ऊपर उठ जाता है, तब शरीर बाधा नहीं बनता। उस अवस्था में न सुख का अनुभव होता है, न ही दुःख का, केवल गहन शांति रहती है। आसन से उठने पर ऐसा अनुभव होता है मानो शरीर ने दीर्घ विश्राम प्राप्त कर लिया हो। यही आसन-सिद्धि है। जब शरीर पूर्णतः साधक के अधीन हो जाता है और स्थिरता प्राप्त कर लेता है, तभी यह समझना चाहिए कि साधना दृढ़ हो रही है। वास्तव में, जब तक आसन स्थिर नहीं होता, तब तक प्राणायाम, ध्यान और अन्य सूक्ष्म साधनाएँ सफल नहीं हो सकतीं। आसन की सिद्धि के पश्चात् अगला चरण है प्राणायाम। जैसा कि पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है-
“श्वास-प्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः”
अर्थात् श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयमित करना ही प्राणायाम है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्राण केवल श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा की समष्टि, जो प्रत्येक जीव के भीतर जीवन-शक्ति के रूप में विद्यमान है। फेफड़ों की गति तो उस प्राणशक्ति की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र है। जब प्राण श्वास को भीतर खींचता है, तब श्वसन की प्रक्रिया आरंभ होती है। प्राणायाम के माध्यम से साधक इसी मूल शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।
प्राण पर अधिकार प्राप्त करने का सबसे सरल और व्यावहारिक मार्ग श्वास-प्रश्वास का संयम है। जब श्वसन की गति नियंत्रित होती है, तो धीरे-धीरे प्राणशक्ति भी संतुलित होने लगती है। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुदृढ़ होता है, बल्कि मानसिक चंचलता शांत होती है और चेतना ऊँचे स्तर की ओर अग्रसर होती है।
इस प्रकार, आसन और प्राणशक्ति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आसन शरीर को स्थिर और शांत करता है, जबकि प्राणायाम जीवन-ऊर्जा को संतुलित कर साधक को आंतरिक जागरण की ओर ले जाता है। योग की सच्ची साधना में आसन आधार है और प्राणशक्ति उसका विस्तार, दोनों मिलकर मनुष्य को आत्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं।

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